मैं भी आप लोगों की तरह एक सामान्य इंसान हूं। लेकिन बचपन से ही मुझे घूमने-फिरने की बहुत लालसा रही है। इसलिए थोड़ा-बहुत मैं अपने बारे में और उन घटनाओं के बारे में बताना चाहूँगा जिसने मुझे घूमते रहने के लिये हमेशा प्रेरित किया।

मेरे जीवन के दो महत्वपूर्ण केंद्र बिंदु रहे हैं…दोस्ती और घुमक्कड़ी। दोस्तों के साथ हमेशा खड़ा रहने के कारण सब-के-सब मुझे अपना सबसे अच्छा दोस्त मानते रहें हैं और साथ में घूमने का कोई मौका नहीं चूकते।

Carrying a backpack & taking selfie at the wjite coloured main temple of Gorakghnath Temple while a Police man in Khaki dress walking behind him with a mask hanging on his name card.  Two women taking hands of their respective childs are also walkinf with few other visitors.
At Gorakghnath Temple

जब मैं ठीक से बोल भी नहीं पाता था, ईया(परदादी) का हाथ पकड़कर अपना गाँव घूमने के लिए जिद करता था। नहीं घुमाने पर रोने लगता था। इसी तरह बचपन में दादा-दादी की कहानियाँ और उनके जीवन की घटनाओं को सुनकर बड़ा हुआ जो हमेशा मुझे फ़ंतासी और रोमांच का अनुभव कराती थीं।

कुछ और बड़ा होने पर पापा कहीं से “कजाख लोक कथाएं” नाम की एक किताब खरीद कर लाए। कजाखस्तान की लोक कथाओं के बारे में पढ़ने के बाद मेरे मन में नई सभ्यता-संस्कृति को जानने और नई-नई अनजानी जगहों को देखने की लालसा बढ़ गई। 

करीब आधी किताब में वहां की कई लोक कथाओं के बाद आगे “अलदाकेन” नाम के एक चरित्र से संबंधित कई कहानियां थीं। उन कहानियाँ में वो गरीबों, दुखियों, कामगारों और दबे-कुचले लोगों की हर तरह से मदद कर के उस समय वहां की रूसी जमींदार “ज़ारों” से बचाते हुए इधर-उधर घूमता-फिरता रहता है। मेरा ये पसंदीदा किरदार मुझे अपने जीवन में हमेशा ऊँचे आदर्श और मूल्यों को अपनाने के लिए प्रेरित करता रहा है।

हाई स्कूल में हिंदी की किताब में पंडित राहुल सांकृत्यायन द्वारा लिखित “घुमक्कड़ शास्त्र” का एक पाठ “अथातो घुमक्कड़ जिज्ञासा” मेरे जीवन पर बहुत ही गहरा प्रभाव डाला।

स्कूलिंग के बाद छुट्टियों में मेरे स्व0 बड़े अंकल खुद पढ़ने के लिए “चंद्रकांता” और “चंद्रकांता संतति” लेकर आये। जिसे बाद में मुझे भी पढ़ने का मौका मिला। उस समय उन दोनों किताबों को पढ़कर किला-सुरंगों, राजा-महाराजाओं, जंगलों-ऐय्यारों(जासूसों) के बारे में जो रहस्य-रोमांच महसूस हुआ, उस की सनसनाहट आज भी महसूस होती है।

सेंट एंड्रयूज डिग्री कॉलेज, गोरखपुर से ग्रेजुएशन करने के दौरान मुझे ट्रेन से गोरखपुर आना-जाना होता था। गोरखपुर रेलवे स्टेशन पर स्थित “यूपी टूरिज्म” के पर्यटक सूचना केंद्र पर मैं अक्सर ट्रेन पकड़ने के पहले बैठा रहता था। वहां अलग-अलग देशों से आने-जाने वाले सैलानियों से मिलकर, बात करके, उनके अनुभव सुनकर मुझे एक अलग ही उत्तेजना महसूस होती थी। 

उन्ही दिनों एक बुक फेस्टिवल में “पंडित राहुल सांकृत्यायन” की “घुमक्कड़ शास्त्र” खरीदने का मौका मिला। उस किताब को खरीदने के बाद मैं इतना उत्साहित हुआ कि सारा काम छोड़ कर मैंने उसे लगातार दो बार पढ़ा।

सच बताऊं तो ये किताब सबको पढ़नी चाहिए क्योंकि हमें क्यों घूमना चाहिए, हमारे पूर्वजों का घूमने का कैसा गौरवशाली इतिहास रहा है और घुमक्कड़ी का हमारी और पूरे मानव जाति की सभ्यता-संस्कृति के उत्थान, प्रचार-प्रसार, पालन-पोषण-संवर्धन में कितना बड़ा योगदान रहा है, इसे पढ़ने के बाद ही पता चलेगा।

साथ ही ये भी मालूम होगा कि “चरैवेति-चरैवेति” के मंत्र को ना मानने के कारण हमारे देश, समाज, सभ्यता और संस्कृति को कितना ज्यादा नुकसान हुआ है। बाद में अलग-अलग जगह घूमने से संबंधित उनकी कुछ और भी किताबें पढ़ीं जो हमेशा मेरे मन को उद्वेलित कर देती थी। 

उन सब का मेरे ऊपर ऐसा प्रभाव पड़ा कि जब मैंने मोबाइल चलाना शुरू किया तो एक मित्रवत भैया “राहुल मणि त्रिपाठी” का नाम कांटेक्ट लिस्ट में “राहुल सांकृत्यायन” के रूप में आज तक सेव करके रखा हुआ है। ताकि जब भी हमारी बात हो तो पंडित राहुल सांकृत्यायन का नाम मेरे मन में कौंध जाय और मुझे घूमते रहने की प्रेरणा बराबर मिलती रहे। 

यही नहीं “27 सितम्बर” को “विश्व पर्यटन दिवस” के अवसर पर मैंने अपना एक और जन्मदिन मनाना शुरू कर दिया था। इन्हीं सब कारणों से मेरे क़रीबी दोस्त मुझे “आवारा द ग्रेट” के नाम से भी बुलाना शुरू कर दिया था।

स्नातक पूरी करने के बाद भारतीय विद्या भवन, नई दिल्ली से “ट्रैवल एंड टूरिज्म” में सर्टिफिकेट कोर्स किया। साथ ही “एयर इंडिया” में “ट्रेनी” के रूप में अनुभव प्राप्त की। फिर कुछ दोस्तों के साथ एक असफल ट्रैवल एजेंसी शुरू करने के बाद “राष्ट्रीय सहारा” में रिपोर्टर के रूप में भी काम किया।

उसी दौरान कई मोबाइल टॉवर से सम्बंधित एक नए पारिवारिक व्यवसाय को संभालना शुरू किया। इस व्यवसाय के सिलसिले में मुझे लगातार इधर-उधर आना जाना पड़ता था। इस कारण मेरे घूमने-फिरने की दिली इच्छा पूरी होती गई। मुझे हमेशा इधर से उधर आना-जाना पड़ता था। एक तरह से मेरे दोनों पैर घर से बाहर ही होते थे। 

सारे दोस्त जब हाल-चाल लेने के लिए फोन करते थे तो मैं कैसा हूं पूछने के बजाय वो सबसे पहले ये पूछते थे कि मैं कहां हूं। और जब कहीं उनके साथ घूमने का प्लान बनता था तो मुझे उन्हें मना करना पड़ता था। क्योंकि लगातार ट्रैवल करते-करते थक जाने के कारण एक जगह से दूसरी जगह जाने के पहले मुझे आराम करने के लिए मौका निकलना पड़ता था।

इस तरह काम के सिलसिले में इधर-उधर घूमते-फिरते, जीवन के हर क्षेत्र में, रिश्तों और परिस्थितियों में उतार-चढ़ाव, हंसी-खुशी, आशा-निराशा व सफलता-असफलता के अनुभवों से लबालब भरे हुए घुमक्कड़, मस्तमौला जिंदगी के कुछ खट्टे-मीठे अनुभव और जानकारी आपके साथ साझा करना चाहूँगा।

ताकि हम एक-दूसरे से कुछ-न-कुछ सीखते हुए लोगों को घूमते रहने के लिए प्रेरित और उत्साहित कर सकें। ताकि साथ-साथ आगे बढ़ते हुए हम एक-दूसरे के दिलों, समाज और मानवता को जोड़ सकें जिसकी आज कुछ ज्यादा ही जरुरत है।

अंत में “आवारा” के नाम से हाई स्कूल के समय लिखी हुई अपनी एक गजल से मैं अपनी बात समाप्त करना चाहूंगा जो मेरी लाइफ को बिल्कुल सही तरीके से प्रतिबिंबित करती है… 

इस शहर से बेघर, एक बंजारा निकल गया;

मेरी फ़ितरत ही ऐसी थी, मैं आवारा निकल गया।

किनारों को रास आई ना, सिमटी हुई जिंदगी;

दरिया को छोड़कर, उसका किनारा निकल गया।

लोगों से ग़म लिए हैं, मुस्कुराहटों के बदले,

हर ग़मो को समेट कर, ग़म का मारा निकल गया।

मंज़िल भी वहीं है, जहाँ शाम ढल गई है;

निकला था जिस सफ़र पे, दुबारा निकल गया।

— मुकेश द्विवेदी “आवारा”

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